भीतर का रावण और अधूरा जिहाद: धार्मिक नैतिकता की विडंबना

सभ्यताओं और धर्मों ने हमेशा मनुष्य को भीतर के अंधकार से लड़ने की शिक्षा दी है। हिंदू चिंतन में रावण सिर्फ एक दहन योग्य पुतला नहीं, बल्कि अहंकार, लालच और क्रूरता का प्रतीक है, जिसे भीतर से नष्ट करना है। इस्लामी शिक्षाओं में जिहाद का असली अर्थ तलवार उठाना नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, अन्याय, घमंड और नैतिक पतन के विरुद्ध संघर्ष है।

लेकिन आज का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जो लोग इन आदर्शों का सबसे ज़्यादा प्रचार करते हैं, वे ही इनका पालन करने में सबसे पीछे हैं। चाहे वे केसरिया ओढ़ें या हरा झंडा उठाएँ, भीतर के रावण और शैतान को पोषित करने में दोनों समान रूप से तत्पर हैं।

आदर्श ऊँचे, आचरण खोखला

रावण का प्रतीकात्मक दहन करना आसान है, पर भीतर की वासना, घृणा और सत्ता-पिपासा को जलाना कठिन। उसी तरह, बुराइयों के खिलाफ जिहाद की घोषणा करना सरल है, पर ईमानदारी से आत्म-संशोधन करना कठिन। धर्म और आस्था का उपयोग आत्मशुद्धि से ज़्यादा पहचान, प्रभुत्व और नियंत्रण के औजार के रूप में हो रहा है।

वे लोगों से कहते हैं कि भीतर के दोषों से लड़ो, मगर अपनी मानसिक विकृतियों को वे संस्कृति, शान या आस्था का नाम देकर सींचते रहते हैं।

व्यावहारिक पाखंड बनाम सिद्धांत

हर विचारधारा खुद को सत्य, शांति और आत्मानुशासन की वाहक कहती है, मगर व्यवहार में तस्वीर उलट दिखती है।

हिंदू नैतिकतावादी जो रावण-दहन की बात करते हैं, वही जातिगत दंभ, राजनीतिक घृणा या बहुसंख्यक अहंकार से घिरे रहते हैं।

मुस्लिम धार्मिक ठेकेदार जो आंतरिक जिहाद की बात करते हैं, अक्सर कट्टरता, लैंगिक असमानता और सांप्रदायिक पीड़ित भाव को नैतिकता का जामा पहनाते हैं। 

दोनों आत्म-नियंत्रण के उपदेश देते हैं, पर आक्रामकता को धार्मिक गौरव बना देते हैं। वे दूसरों की बुराइयां गिनते हैं, मगर अपनी दुष्टताओं से समझौता करते हैं; इनकी वैचारिकता, सिद्धांतों से नहीं, सुविधाओं से संचालित होती है; रिवाज़ ज़्यादा, आत्मचिंतन कम।

बांस और काग़ज़ का रावण जलाना सरल है, मगर मन के रावण को जलाना कठिन, क्योंकि वह इच्छा, वर्चस्व और झूठ से बना होता है।

दूसरों पर जिहाद छेड़ना आसान है, खुद पर लगाम कसना कठिन, क्योंकि उसमें त्याग और सत्य निष्ठा की ज़रूरत होती है।

त्यौहार और भाषण आत्म-परिवर्तन के साधन बनने के बजाय धार्मिक मनोरंजन में बदल गए हैं।

घृणा को गौरव बनाकर, झूठ को रणनीति बताकर और पक्षपात को परंपरा बताकर भीतर का रावण रोज़ पलता है।

नैतिकता का मुखौटा

जो स्वयंभू धर्मरक्षक हैं, वे ही अक्सर विभाजन और कट्टरता के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं।

वे शुद्धिकरण की बातें करते हैं, मगर अशुद्ध मानस पर सवाल नहीं उठाते।

शास्त्रों को उद्धृत करते हैं, पर आत्म-समीक्षा से बचते हैं।

दूसरों पर नैतिकता थोपते हैं, मगर अपने लिए अपवाद गढ़ते हैं।

इनकी भक्ति मुखर है, मगर अंतरात्मा मौन।

असली संघर्ष भीतर है

यदि रावण का दहन करना है, तो वह ईर्ष्या, कट्टरता, छल और सत्ता-लोभ के रूप में होना चाहिए।

यदि जिहाद करना है, तो अहंकार, लालच और हिंसक विचारों पर नियंत्रण को लेकर जीवन भर की साधना होनी चाहिए।

दुनिया इसलिए नहीं बिगड़ रही कि धर्म गलत सिखाते हैं, बल्कि इसलिए कि उनके प्रवक्ता अपने ही संदेशों को आत्म-अवलोकन से बचाने की ढाल बना लेते हैं।

जब तक मनुष्य भीतर का रावण नहीं जलाएगा और आत्म-संघर्ष को प्राथमिकता नहीं देगा, तब तक न जिहाद पूरा होगा और न रावण मरेगा।त्योहार आते रहेंगे, भाषण गूंजते रहेंगे और भीतर की अंधकार सुरक्षित रहेगा।

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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